निर्देशक - शूजीत सरकार
लेखक - जूही चतुर्वेदी
कलाकार - अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज, बृजेंद्र काला
रेटिंग - 3.5/5
ओटीटी प्लेटफॉर्म - एमज़ॉन प्राइम
कोरोना वायरस के कारण देश के सभी सिनेमाघर बंद हैं । इसलिए पिछले तीन महीने से एक भी फ़िल्म रिलीज नहीं हो पाई है । लेकिन अब फ़िल्ममेकर्स ने अपनी अटकी पड़ी फ़िल्म को रिलीज करने के लिए ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म का सहारा लिया है । इसमें सबसे पहले रिलीज हुई शुजीत सरकार की फ़िल्म गुलाबो सिताबो । अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की गुलाबो सिताबो आज अमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई है ।
‘गुलाबो खूब लड़यं, सिताबो खूब लड़यं... हलवा खा के लड़यं, बरफी खा के लड़यं.’ इन लाइनों को दोहराते हुए ‘गुलाबो सिताबो’ सड़क किनारे चल रहा कठपुतलियों का एक छोटा सा मजमा दिखाती है. यह नज़ारा लखनऊ शहर की गलियों के लिए आम बात मानी जा सकती है लेकिन यहां पर जो खास और दिलचस्प है, वह इसमें दिखाया जाने वाला किस्सा है. इस रोड-ब्रांड-कठपुतली शो में सिताबो एक हाउसवाइफ है जो घर के काम करते-करते थक और पक चुकी है, वहीं गुलाबो उसके पति की आरामतलब प्रेमिका है और घर में इनकी कभी न खत्म होने वाली लड़ाई दिन-रात चलती रहती है. इसी किस्से को नई तरह से दोहराते हुए ‘गुलाबो सिताबो’ एक बूढ़े मकान मालिक को सिताबो और अड़ियल किराएदार को गुलाबो बनाती है और उनकी छिछली लेकिन चटपटी लड़ाइयों से अपना सिने संसार रचती है।
गुलाबो सिताबो, एक किराएदार और मकान मालिक के बीच की आपसी लड़ाई की कहानी है । 78 वर्षीय मिर्ज़ा चुन्नन नवाब (अमिताभ बच्चन), फातिमा बेगम (फ़ारुख जफ़र) जो उनसे लगभग 17 साल बड़ी है, पति-पत्नी हैं । बेगम की लखनऊ में एक 100 साल से भी पुरानी हवेली है जिसका नाम फ़ातिमा महल है । यहां वह अपने पति मिर्ज़ा के साथ रहती हैं । बेगम, क्योंकि बहुत बूढ़ी हो चुकी हैं, इसलिए हवेली की देखरेख की जिम्मेदारी अपने पति मिर्ज़ा को सौंपती है । फ़ातिमा महल का एक हिस्सा कई सारे किराएदारों के पास है जो बहुत कम किराए में वहां रहते हैं । इन्हीं किराएदारों में से एक किराएदार है बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना) । बांके का परिवार इस हवेली में बरसों से रह रहा है जो किराए के नाम पर महज 30 रु महीना देता है । इसलिए मिर्ज़ा बांके को हवेली से निकालना चाहता है । मिर्ज़ा बांके से किराया बढ़ाने की कहता है तो वह गरीब कहकर ज्यादा किराया देने से इंकार कर देता है । वहीं पैसों की कमी के कारण मिर्ज़ा जर्जर हवेली की मरम्मत करावा पाने में सक्षम नहीं है । हवेली की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि बांके एक लात से शौचालय की दीवार तोड़ देता है । मिर्ज़ा इस नुकसान की भरपाई बांके से करवाना चाहता है लेकिन बांके ये कहकर इंकार कर देता है कि हवेली की मरम्मत की जिम्मेदारी मकान मालिक की होती है । इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचता है । इसी बीच एंट्री होती है आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (लखनऊ सर्कल) के मिस्टर गणेश मिश्रा (विजय राज) की । गणेश धौंस दिखाने वाला एक चालाक ऑफिसर है, जो यह भांप लेता है कि यह जर्जर खंडहर नैशनल हैरिटेज प्रॉपर्टी (शायद नहीं भी) बन सकता है । वह बांके को कंवेंस करता है कि कैसे उसका प्लान उनके (बांके) और बाकी के किराएदारों के लिए बेहतर साबित हो सकता है । वहीं मिर्जा भी अपने वकील क्रिस्टोफ़र क्लार्क (ब्रिजेन्द्र काला) से मिलते हैं, जो कि प्रॉपर्टी के लफड़ों को सुलझाने में माहिर है । वकील मिर्ज़ा को सलाह देता है कि उसे ये हवेली बेच देनी चाहिए फ़िर सारा झगड़ा ही खत्म हो जाएगा । हालांकि इस हवेली की मालकिन तो बेगम है तो इस नाते इस हवेली पर उसके भाई-बहन का भी मालिकाना हक हो सकता है । इसलिए मिर्ज़ा पहले ये पता लगाता है कि उसके भाई-बहन कहां हैं । इसके बाद फ़िल्म में आगे क्या होता है, यह फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।
वहीं, किराएदार बांके की भूमिका में आयुष्मान खुराना भी अपनी निकली हुई तोंद और उसी दर से बढ़ रहे तनाव के साथ भरोसेमंद अभिनय करते हैं. हालांकि कई बार जल्दबाज़ी में संवाद बोलते हुए उनके भीतर का दिल्ली वाला बाहर निकलता दिखता है लेकिन उनके एक्सप्रेशन और देहबोली इस खोट से हमारा ध्यान हटाने में सफल हो जाती है.आयुष्मान खुराना की अदाकारी भी काफी मनोरंजक हैं लेकिन उनका स्क्रीन टाइम अमिताभ की तुलना में काफ़ी कम है । यह लगातार दूसरी बार है जब आयुष्मान ने विस्तारित सहायक भूमिका के लिए समझौता किया है । इससे पहले शुभ मंगल ज्यादा सावधान (2020) में भी उनका एक विस्तारित सपोर्टिंग रोल था ।
फ़ारुख जफ़र की महत्वपूर्ण भूमिका है और वह अपना अमिट प्रभाव छोड़ती हैं । सेकेंड हाफ़ के दो सीन में तो वह छा जाती हैं । इंटरनेट एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का जाना-पहचाना चेहरा बन चुकीं सृष्टि श्रीवास्तव भी फिल्म का हिस्सा हैं और अपने काम से ध्यान खींचती हैं. सृष्टि श्रीवास्तव (गुड्डो) काफी आत्मविश्वासी हैं । पूर्णिमा शर्मा (फौज़िया), अनन्या द्विवेदी (नीतू), उजली राज (पायल), सुनील कुमार वर्मा (मिश्रा जी), जोगी मल्लंग (मुनमुन जी), राजीव पांडे (पुलिस निरीक्षक) और बेहराम राणा (अब्दुल रहमान) जैसे अन्य कलाकार अपने किरदार में जंचते हैं । उनके अलावा विजय राज़ और बृजेंद्र काला भी ज़रूरी भूमिकाएं निभाते हैं लेकिन नया कहा जा सके, ऐसा कुछ नहीं करते हैं.
कहानी और अभिनय के अलावा, अविक मुखोपाध्याय की सिनेमैटोग्राफी भी ‘गुलाबो सिताबो’ को नायाब बनाती है. कहना चाहिए कि हवेली को फिल्म का तीसरा किरदार बना देने में जितना योगदान जूही चतुर्वेदी की लिखाई का है, उतना ही मुखोपाध्याय के कैमरे का भी है. उनका कैमरा हवेली को कुछ इस तरह दिखाता है कि उसके कल का भी अंदाजा लगता है और आज का भी. फिल्म में कई शॉट ऐसे है जिनमें इसके पुरानेपन और सीलन को देखकर इमारत का अकेलापन महसूस होने लगता है।
शूजीत सरकार का निर्देशन अच्छा है । लेकिन उनके हाथ में एक कमजोर स्क्रिप्ट थी इसलिए वह इसके साथ ज्यादा कुछ नहीं कर सके । हालांकि, हमने उनके द्दारा बनाई गई फ़िल्में जैसे- विकी डोनर और पिकू जैसी फ़िल्में देखी है, जिसमें उनकी प्रतिभा निकलकर सामने आती है । गुलाबो सिताबो उसी जोन की फ़िल्म है लेकिन उनका निर्देशन परफ़ेक्ट नजर नहीं आ पाता । वहीं कुछ अच्छी चीजें भी हैं- जैसे वह लखनऊ की खूबसूरती को अच्छे से कैप्चर करते हैं । बड़े पर्दे पर इसका अनुभव कुछ अलग ही होता । वहीं वह अपने कलाकारों से बेहतरीन प्रदर्शन करवाने में सक्षम होते हैं । वहीं दूसरी ओर, फ़िल्म में से हास्य गायब है जो फ़िल्म में कमी छोड़ता है । इसके अलावा कुछ सीक्वंस चौंकाने वाले हैं, खासकर मिर्ज़ा के किरदार में । एक तरफ, तो वह काफी समझदार और पैसे वाला था, जिसने बेगम से शादी की । वहीं दूसरी तरफ़ वह इतना सज्जन था कि उसे घर में रखी चीजों की सही कीमत भी नहीं पता थी और तो और उस हवेली में जिसमें वह सालों से रहता है, उसे ही बेचने चला गया था ।
फ़िल्म का संगीत 


शांतनु मोइत्रा, अभिषेक अरोड़ा और अनुज गर्ग के संगीत में कोई जान नहीं है । थीम संगीत आकर्षक है और अच्छी तरह से काम करता है । ‘मदारी का बंदर’ वो गीत है जो फ़िल्म की थीम से मेल खाता है । बाकी के गीत जैसे ‘क्या लेके आवो जगमे’, ‘कंजूस’, ‘बुद्धू’ आदि यादगार नहीं हैं । बैकग्राउंड स्कोर क्वर्की और बहुत बेहतर है ।
कुल मिलाकर, गुलाबो सिताबो घर पर देखने के लिए एक मनोरंजक फ़िल्म है । ह्यूमर की कमी और औसत स्क्रिप्ट के बावजूद यह फ़िल्म अपने दमदार परफ़ोर्मेंस, लखनऊ में सेट और अंत में एक ट्विस्ट के बल पर काम करेगी ।बेकार कहानी। उम्दा कलाकार होने के बाद भी लचर कहानी ने प्रभाव नही छोड़ा।